जब हनुमान ने श्रीराम के बात की अवहेलना की

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भारतीय संस्कृति में भक्तों के प्रति भक्ति की भावना देखते बनती है. पुराणों में एक से बढ़ एक भक्त हुए जो अपने अलग अलग भक्ति में निहित हो अमरता का अमरत्व छोड़ गए, किस्से भरे पड़े हैं ग्रंथों में . उन्ही में से एक भक्त हुए हनुमान जिसे इतिहास के सामानांतर देखें तो कोई बराबर में नहीं दिखता . शायद अपने प्रभु श्रीराम की भक्ति में लीन हुए हनुमान की कहानी एक पर एक है जो अपने आप में अनुपम है . उनकी सरलता , भावुकता , आत्मानुशासन , समर्पण इत्यादि ने उन्हें पौराणिक संस्कृति में सबसे बड़े भक्त का दर्जा दिया और शायद भक्ति शब्द ही उनकी इस भक्ति का प्रादुर्भाव है. पर एक समय ऐसा भी आया जब भक्त हनुमान अपने प्रभु श्री राम के आदेश को भी मानने से इनकार कर गए.  जी हाँ , रामायण में एक प्रसंग आता है  जब हनुमान ने अपने स्वामी के बात को भी नहीं माना . रामायण की इस कहानी को भोजपुरी के कुछ सुन्दर भजनों का आनंद लेते हुए जाने .

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तुलसीदास (१५३२-१६२३) रचित महाग्रंथों में से एक रामायण की प्रति ‘रामचरित मानस’ की रचना बनारस के अस्सी घाट पर की  जो उस समय अवध सूबा का क्षेत्र (अब उत्तर प्रदेश ) था और उस समय भारत पर मुगलो का राज्य था तथा  मुग़ल अपने प्रभाव की चरम सीमा पर थी , .तुलसीदास ने अपने जीवन काल में तीन मुग़ल सम्राट देखे हुमायूँ  के शासनकाल में इनका जन्म हुआ , अकबर के शासनकाल को इन्होने बड़े करीब से देखा और उनकी यह रचना लोगो के मानस पर राम के चरित की एक और लेयर चढ़ा दी . और अपने क्षेत्र में अपने वैष्णव प्रथा का प्रचार प्रसार किया और शाहजहाँ  के समय इनकी मृत्यु हुयी . अपने इश्वर को अलग अलग रूपों में देखते इन तरहों की कई प्रथाएं थी शैव, शक्ति, गाण्य , गोरखी इत्यादि . इतिहास कहते हैं भारत में शंकराचार्य के समय (७८८ इश्वी) समाज तक़रीबन ७८९ से भी ज्यादा सम्प्रदायें थीं और इनके  माननेवालों के लिए  इनके इष्ट से बढ़ कर थे.

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इस प्रकार अपने इन मतभेदों के कारण मुठभेड़ नियति थी और आदि शंकराचार्य (जन्म ७८८ इसवी कोच्ची, केरला ; मृत्यु – ८२० इसवी केदारनाथ उत्तराखंड ) अपने मात्र ३२ वर्ष की आयु में कई सम्प्रदायों को एक करते हुए  हिंदुस्तान के चारों कोनो पर एक एक कर चार मठो (आनंद मठ -रामेस्वरम , गोवर्धन मठ- जगन्नाथ पूरी , शारदा मठ -द्वारकाधीश , ज्योतिपीठ मठ -बद्रीनाथ )  की स्थापना करते हुए हिन्दुओं को एकत्रित किया और बौद्धिक चेतना दी . शंकराचार्य के जीवन की एक छोटी सी कथा है की शंकर के पिता श्री शिवागुरु और माता आर्याम्बा बहुत दिनों तक नि:संतान थे और वर्षों की शिव भक्ति के बाद एक रात आर्यम्बा को शिव ने स्वप्न में दर्शन दिए और कहा की उनके पुत्र के रूप में वह स्वयं अवतरित होंगे. इस प्रकार  हिन्दू समुदाय आदि शंकराचार्य को भगवन शिव का ही  अवतार मानते हैं .
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आदि शंकराचार्य ने किसी देवता के महानता व बाहुल्यता को कम नहीं करते हुए आराध्य शिव की दिव्यता और भव्यता  बतलाई . और इस प्रकार के अपने प्रतिपादित अद्वैतवाद के  सिंद्धांत से  शैव संप्रदाय को एक नयी दिशा दी. रामायण में देखें तो भगवन श्री राम ने अपने इष्ट शिव की अराधना की तो खुद भगवान शिव अपने प्रभु श्री राम में ही रमे रहे . रामायण वैष्णव प्रथा एक महान ग्रन्थ है और इसी कढ़ी में तुलसीदास  रचित रामचरित मानस ने वैष्णव सम्प्रदायों के अलग अलग इष्टों में से एक श्री राम के कथा का वर्णन किया है . इन्ही कथाओं में से एक कथा के बीच एक कथा को पढ़ते हुए भजन का भी आनंद लेंगे ताकि समझ का साझा विस्तार हो सके.

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राम के अनन्य भक्त हनुमान जो बच्चों में हनुमैन के नाम से जाने जाते हैं युवाओं में बलवान वृद्धावस्था में राम भक्त हनुमान ,राम के हर इच्छाओं को शिरोधार्य करते थे . बिना मन जाने भी उनकी इच्छाएं पूरी कर देते . ऐसे एक नायाब भक्त ने अपने प्रभु के बात की अवहेलना की .यह एक अड़चन वाली बात है की हर आदेशों को मानाने वाला हनुमान अपने स्वामी के आदेशों की अवहेलना की . इस प्रकार कई प्रेररणादायक कहानियों में से एक कहानी है की –जब हनुमान ने श्रीराम के बात की अवहेलना की .

जब हनुमान ने श्रीराम के बात की अवहेलना की


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कहानी है श्री राम के अपने चौदह वर्ष बनवास के बाद , राज्याभिषेक के दिन जब श्री राम का राज्याभिषेक हो रहा था तो भक्त हनुमान थोड़ी दूर अपने प्रभु श्री राम के ध्यम में मग्न अपनी आँखों से लगातार अश्रुपूरित हो रहे थे . तब माता सीता ने यह भाव देख श्री राम की और देखा . हनुमान भक्त राम महावीर हनुमान के पास गए और बोले ,”हनुमान ! हम तुम्हारी भक्ति से इतने प्रसन्न हैं की हमारे पास तुम्हे देने लायक कोई चीज़ नहीं है तुम अतुल्य हो . इसीलिए मैं केवल तुम्हे अपने साथ वैकुंठ ले जा सकता हूँ .” इसपर हनुमान ने पूछा , “क्या प्रभु आप वहां होंगे ?” प्रभु बोले मैं विष्णु बन तुम्हारे समक्ष रहूँगा . वह मेरी ही प्रतीति हैं और मैं उनकी .”

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लेकिन यह जवाब हनुमान के लिए इतना गहरा था की उन्हें प्रभु की इस बात की अनदेखी कर बोले ,” हे राम | मेरे मन में तो सिर्फ राम ही है | मैं तो राम में इतना राम गया हों की जहाँ राम न हो वहां मन ही नहीं लगेगा | इसीलिए अपने मन लगाने हेतु मैं इसी धर परा पर राममय रहूँगा . “ और इस प्रकार अपने प्रभु के बात की अवहेलना करते हुए भी राम भक्ति की एक मिशाल कायम की . यही भक्ति समर्पण है , जीवन है . अपने कर्मो के प्रति सजग रूप से आपकी भक्ति दयानिधान राम निर्देश दें .

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कथा का विश्राम भोजपुरी गायक व अभिनेता कल्लू के गाये एक सुन्दर भजन के साथ . अगर आपको यह लेख अच्छा लगा हो तो अपने विचार नीचे के कमेन्ट बॉक्स में ज़रूर लिखें . आपके ये विचार हमें हमारे कम में अग्रसरित करेंगी ..

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